Friday, May 6, 2011

हाथ के कंगन रखे हैं , कंठ की माला रखी है,
आँख का काजल रखा है, होठ की हाला रखी है,
वक्ष की चूनर रखी है ,देह की मखमल रखी है ,
आग, पानी में लगाती ,प्रीत की ज्वाला रखी है ,
हो सके तो आज इनमें ,प्राण का संचार कर दो,
आपकी इतनी सजीली, सुरमई यादें रखीं हैं ,
हो सके तो आज कोई भेंट में स्वीकार कर लो,
अश्रुपूरित से द्रगों में पूर्णिमायें झाँकतीं हैं,
हो सके तो आज उनमें इक नई झंकार भर दो,

हाथ के कंगन रखे हैं ,कंठ की माला रखी है,
आँख का काजल रखा है ,होठ की हाला रखी है,
वक्ष की चुनरी रखी है, देह की साड़ी रखी है,
आग ,पानी में लगाती ,प्रीत की ज्वाला रखी है ,
हो सके तो आज इनमें प्राण का संचार कर दो,

Monday, April 11, 2011

यह छलक कर बह रहा है, यह मचल कर बह रही है, बीच में कितने युगों की ,कसमसाहट बह रही है, एक आँसू बह रहा है, एक नदिया बह रही है, बीच में कितने दिलों की ,टीस गहरी बह रही है,
हैं हवायें सब निरुत्तर, हैं दिशायें सब निरुत्तर, यह किसी की जुस्तजू में , रिक्त होता जा रहा है,
बर्फ की चट्टान पिघली, तो नदी यह बन गयी थी, किन्तु यह तो खुद पिघलकर ,खुद बरसता जा रहा है,

Sunday, April 10, 2011

चिर- प्रतीक्षित से द्रगों से ,यह निकल कर आ रहा है, मौन अपनी वेदना का ,रेत पर टपका रहा है,
एक आँसू बह रहा है, एक नदिया बह रही है , बीच में कितने युगों की प्यास गहरी बह रही है,

Tuesday, April 5, 2011

व्योम भरने के लिए ही ,हम यहाँ मिलते -बिछुड़ते , लुप्त होने के लिए ही वक्त से लड़ते-झगड़ते , किन्तु फिर भी अस्मितायें ,साथ चलतीं हैं हमारे, देह का आकार लेकर ,प्राण में उन्मेष भरते ,
व्योम भरने के लिए ही ,हम यहाँ मिलते -बिछुड़ते , लुप्त होने के लिए ही वक्त से लड़ते-झगड़ते , किन्तु फिर भी अस्मितायें ,साथ चलतीं हैं हमारे, देह का आकार लेकर ,प्राण में उन्मेष भरते ,

Monday, April 4, 2011

हम कभी होंगे अलग यह, प्रश्न ही पूरा गलत है , प्रेम के एहसास में ही, जन्म लेता यह जगत है, आज तेरी कल्पना ही ,हो गई मनुहार मेरी , रोज मेरी हर कशिस अब ,जिन्दगी का एक ख़त है ,

Sunday, April 3, 2011

हम कभी होंगे अलग यह ,प्रश्न ही पूरा गलत है, प्यार के अहसास में ही ,जन्म लेता यह जगत है ,

Saturday, April 2, 2011

जिन्दगी के ये थपेड़े ,कुछ सम्हलने के लिए हैं ,किन्तु दिल की हसरतें , कुछ कर गुजरने के लिए हैं ,छोड़ दूँ कैसे जमीं पर ,स्वप्न जो बिखरे हुए हैं ,अश्रु से मेरे इन्हीं की ,फ़स्ल उगने के लिए हैं
चाहता हूँ बाग़ कोई ,याद में तेरी लगा लूँ , पक्षियों को डालियों पर ,डोलने को ही बुला लूँ , चहचहा कर जब कहेंगे ,हाल तेरा वो यहाँ पर , क्या पता उन शोखियों की, छाँव में खुद को भुला दूँ,

Monday, March 28, 2011

मान लूँ कैसे यहाँ अब ,यह धरा मेरी नहीं है, आसमाँ मेरा नहीं है, जिन्दगी मेरी नहीं है, तैरते हैं स्वप्न क्यों फिर इस धरा की हलचलों में , प्यार का कोई बहाना, आज अब मेरा नहीं है..

Sunday, March 27, 2011

मंत्र मुग्धा ,स्वप्नदर्शी ,उर्वशी का रूप लेकर, क्या गजब तुम ढा रहीं थीं , ज्योत्स्ना की धूप लेकर, यह समुन्दर और बादल ,बन गए झरने तुम्हारे, तुम बिछाने आ गईं थीं ,जुस्तजू को सूप लेकर, खिल गईं कलियाँ सुकोमल, भोर की पहली किरन से, कल्पना में भाव-भीनी, कामनायें आ गईं थीं ,... बस तुम्हारी सुष्मिता की,अस्मितायें छा गईं थीं ....

Saturday, March 26, 2011

तुम धरा थीं या धरा का, रूप लेकर आ गईं थीं,
अनगिनत ऋतुएँ तुम्हारी देह पर लहरा गईं थीं,
पारदर्शी -चितवनों में ,बिम्ब झलके थे यहाँ फिर,
बस तुम्हारी सुष्मिता की,अस्मितायें छा गईं थीं,

Friday, March 25, 2011

यह जहाँ कितना हसीं है, सिर्फ तेरी ही कमी है,
सागरों में सिर्फ मेरे ,आंसुओं की ही नमी है,
तू नहाती है यहाँ जब, लोक तीनों डूबते हैं ,
सिर्फ तेरे ही लिए यह,जिन्दगी जैसे थमी है,
बादलों से फिर बरस कर ,बूँद अमृत की बहा ले,
यह हवायें चल रहीं हैं,हाथ में फिर हाथ डाले,

Thursday, March 24, 2011

यह नज़ारे खिल रहे हैं,एक तेरी ही झलक से,
लग रहा तू आ रही है, आज फिर जैसे फलक से,
खुशबुएँ कितनी नशीली, भीग कर बहने लगीं हैं,
चाहता हूँ साँस ले लूँ आखिरी तेरी ललक से,
क्या पता तू प्यार का, सामान फिर कोई जुटा ले ,

Wednesday, March 23, 2011

यह हवायें चल रहीं हैं,हाथ में फिर हाथ डाले,
आ रहे हैं हर तरफ से, आज तेरे ही उजाले,
क्या पता प्रतिबिम्ब तेरे ,झील में दिखने लगें फिर ,
क्या पता तू वक्ष से फिर ,झूमकर मुझको लगा ले ,

Monday, March 21, 2011

क्या बचा है इस धरा पर, क्या बचा है आसमाँ में,
एक जीवन प्यार का था, सो गया है, गुलसिताँ में,
एक बादल छा रहा है ,पुतलियों के बीच में फिर,
क्यों बरसना चाहता है, हलचलों के दरमियाँ में,
अमरीका व नाटो देशों की चेतावनी के बाबजूद जब गद्दाफी ने
जन विद्रोह दबाने के लिए सैनिक कार्रवाई तेज कर दी ,मजबूरन ,
नाटो देशों को नो फ्लाई जोंन घोषित करना पड़ा और लीबिया में शांति स्थापित करने के लिए
हवाई हमला करना पड़ा /यह बात और है उन्हें किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देने का हक़ नहीं है,
मगर तेल उत्पादक देशों में अशांत बातावरण भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता /
पूरी दुनिया की खनिज तेल आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है/
नाटो देशों की यह कार्रवाई अगर प्रशंसनीय नहीं तो अनुचित भी नहीं है/
तुषार, वैशाली, गाजियाबाद..

Wednesday, March 16, 2011

हो सकता है इस दुनिया में, मंजर सभी तबाही के हों,
लेकिन एटम की झाड़ू से,मंजर सारे मिट जाते हैं ,
माना मुश्किल है दुश्मन से ,लोहा लेना युद्ध-भूमि में ,
लेकिन एटम की धूलों से, खाक नज़ारे हो जाते हैं ..

Tuesday, March 15, 2011

परमाणु शक्ति का अब तो, खेल शुरू होने बाला है,
अमरीका से जाकर पूछो ,कितनी उसकी मूँछ बची है

Monday, March 14, 2011

मुक्त गगन में मन का पंछी, उड़ने की जिद क्यों करता है,
मुक्त हवाओं के झोंकों में ,ऋतुओं का मेला लगता है,
मदिर -मदिर -सी तेरी ऋतुएँ ,मुझको यहाँ बहानी हैं,
मुझको अब तो इस दुनिया में ,दुनिया नई बसानी है,...
मुझसे न पूछ आकर ये आँखों में तलब क्यों है,
बस इतना मुझे बता दे ,तू इतनी गजब क्यों है ,
ओस बिछेगी जब धरती पर, सूरज पीने आ जायेगा ,
लेकिन मेरा आँसू तो बस , तेरा बादल बन जायेगा ,
कोई प्यासा अगर मिला तो ,उसकी प्यास बुझानी है,
मुझको अब तो इस दुनिया में ,दुनिया नई बसानी है ....2

Sunday, March 13, 2011

अब जितने भी पल आयेंगे , सब तेरे ही हो जायेंगे,
मुझको अब तो इस दुनिया में , दुनिया नई बसानी है,
गीत लिखूँगा जब भी तेरे , दिल की राहों से गुजरेंगे ,
अरमानों की सुबहा कोई ,मुझको नई जगानी है ...1

Saturday, March 12, 2011

इस जहाँ में वो तुम्हारे , फाग इतने घुल चुके हैं ,
धूल -मिट्टी में मिला दूँ ,एक बगिया किस तरह मैं,

Friday, March 11, 2011

क्यों मुझे इतिहास का इक, मकबरा अच्छा लगा है,
इक शहंशाह के जिगर का ,तस्करा अच्छा लगा है,
क्यों तुम्हारा जिक्र अक्सर , एक यमुना कर रही है,
क्यों रूहानी जिन्दगी का ,मशबरा अच्छा लगा है ,
चाँद भीगा जा रहा था , रात डूबी जा रही थी ,
सिलसिला जो प्यार का था , आँसुओं पर मुस्कुराया,

Thursday, March 10, 2011

जब तुम्हारी याद आई, चाँदनी में , मैं नहाया,
शोखियों का एक मंजर, आँसुओं में छलछलाया ,
रात-रानी की हवा में ,खुशबुएँ बहने लगीं हैं,
एक पल में फिर बसा लूँ , एक दुनिया किस तरह में ,

Wednesday, March 9, 2011

बंद पलकों में तुम्हारे ,ख्वाव इतने भर चुके हैं,
एक आँसू में बहा दूँ ,एक दरिया किस तरह मैं ,
आयने में और तुममें ,फर्क अब क्या रह गया है,
जिन्दगी आकर खड़ी है ,आयने के सामने,

Tuesday, March 8, 2011

चाहता हूँ आयने में, .कैद तुमको कर सकूँ,
प्यार मेरा झिलमिलाये ,आयने के सामने ..
क्यों बिखरना चाहता हूँ ,क्या समझना चाहता हूँ,
होश मेरे खो रहे हैं,आयने के सामने ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,आयने के सामने,
वो, अभी तक छा रहे हैं ,आयने के सामने ,
आयने से बात करके ,जी बहलना चाहता है,
एक कतरा और दिल का ,यों सिसकना चाहता है,

Monday, March 7, 2011

आज सारी धूल उड़कर ,इस तरह गुजरी यहाँ पर ,
आँख में जैसे उसी की ,धुन्द के बादल भरे थे ,
एक बंजर जिन्दगी से, वो लिपटती जा रही थी ,
राह में जैसे उसी की ,देह के बल्कल पड़े थे,
सैकड़ों बिखरी हुई सी कतरने उड़ने लगीं थीं ,
बेतहाशा ,सरसराती,आंधियां उठने लगीं थीं,
क्या पता कबसे जिगर के ,स्रोत सूखे जा रहे थे ,
काल-कवलित मृगतृषायें ,खाक में मिलने लगीं थीं ,
स्वप्न तो क्या देखते हम धूल के काजल भरे थे ,

Thursday, March 3, 2011

न कोई भी किनारा था , न कोई भी हरारा था,
कहाँ तक दूर जायेंगे ,तसब्बुर बस तुम्हारा था,
घिरी तूफाँ में किश्ती थी, भंवर भी बस तुम्हारे थे,
न बाहर हम कभी निकलें ,इरादे ये हमारे थे ,

Wednesday, March 2, 2011

युगों की प्यास अधरों पर,कहाँ तक बुझ गई होगी,
सुधा की बूँद से भरकर ,समंदर बन गई होगी,
कभी बुलबुल सुनाने को, तराने आ गई होगी,
बहारों की छठा कोई, उतरकर छा गई होगी,
कभी सूरज थमा होगा, कभी चंदा थमा होगा,
तुम्हारे हुस्न में डूबी, क़यामत आ गई होगी,
कहानी जब बनी होगी, तुम्हीं से लिख गई होगी,
निगाहों में , निगाहों की ,निशानी बन गई होगी,
कभी झरने झरे होंगे ,कभी बादल उठे होंगे ,
कभी रिमझिम फुहारों में ,जवानी खिल गई होगी,

Tuesday, March 1, 2011

रूह में तेरे कभी की,रूह मेरी मिल चुकी है,
इस धरा की शोखियों में, झिलमिलाती दिख रही है,
शेष मुझमें क्या बचा है, एक मिट्टी का खिलौना,
वक्ष पर महके हुए ,वात, तेरे चल रहे हैं ,

Monday, February 28, 2011

कामिनी का बिम्ब कोई ,झील में उतरा हुआ है ,
मधु-ऋतु का एक मौसम ,फिर यहाँ बिखरा हुआ है,
पूछती हैं क्यों हवाएं , हाल मेरी धड़कनों का ,
कुफ्र में लिपटे हुए, हालात मेरे चल रहे हैं ,
सिर्फ तुझसे ही शुरू थी, जिन्दगी की ये कहानी,
हुस्न में डूबे हुए ,जज्बात मेरे चल रहे हैं,

Sunday, February 27, 2011

द्रश्य चेतन, ओ, अचेतन ,इस तरह क्यों खींचते हैं ,
प्रियतमा के बिम्ब अक्सर, आत्मा में दीखते हैं,
मैं नहाया डूबकर जब, फ़क्त इतना याद आया,
रेत की सूखी सतह पर ,मीन, उछली जा रही थी,
मैं नहाया आंसुओं में ,रात फिसली जा रही थी ,

Saturday, February 26, 2011

शब्द के कतरे पिरोकर ,वेदना जब गुनगुनाई,
बूँद अमृत की बिलोकर , बह रही थी रोशनाई,
प्रीत का इजहार कितने युग अनंतों तक चलेगा ,
व्योम में छिटकी हुई -सी एक बदली गा रही थी,
शब्द के कतरे पिरोकर ,वेदना जब गुनगुनाई
बूँद अमृत की बिलोकर, बह रही थी रोशनाई, ,
प्रीत का व्यापार कितने युग अनंतों तक चलेगा,
व्योम में छिटकी हुई -सी एक बदली जा रही थी,
मैं नहाया आंसुओं में, रात फिसली जा रही थी,
पर्वतों पर जो जमीं थी बर्फ पिघली जा रही थी ,
क्यों मुझे इतना नहाना ,इस तरह अच्छा लगा था,
बात तेरी चल रही थी , जान निकली जा रही थी ,

Friday, February 25, 2011

अवतरित होकर जगत में, इस तरह फिर आ गईं तुम,
काल- भैरब जिन्दगी में ,अफ्सरा- सी छा गईं तुम,
इक चिरंतन सत्य झलका , पारदर्शी -इंगितों में,
स्रष्टि की परिकल्पना में,दामिनी -सी घुल गईं तुम,
चाँद से बातें हुईं जब, चांदनी में घुल गईं तुम,

Wednesday, February 23, 2011

ताज फीका पड़ रहा था, वक्त धीमे चल रहा था ,
गुरबतों का इक शहंशाह ,गुलबदन से मिल रहा था ,
चाँद का था बस बहाना ,बात तुमसे हो रही थी ,
रश्मियों की थीं फुहारें , लावनी में धुल गईं तुम ,
चाँद से बातें हुईं जब............................

Tuesday, February 22, 2011

चाँद से बातें हुईं जब, चांदनी में घुल गईं तुम,
रात के नीरव क्षणों में ,रागिनी- सी घुल गईं तुम,
दूर तक कोई नहीं था ,तुम उतरती जा रहीं थीं ,
एक आँचल में लिपटकर ,मोहिनी -सी खिल गईं तुम ,

Sunday, February 20, 2011

अक्स मन का आयनों में ,देखने की जिद मुझे है,
आँख में मेरी उतरकर , आयनों को गश दिला दो,
रात- रानी की हवा में ,खुशबुएँ बहने लगीं हैं,
एक खुशबु और उनमें, घोलकर मेरी मिला दो ,

Tuesday, February 8, 2011

स्वप्न में आने लगे वो ,धड़कनों से बात करने ,
इस जहाँ में जिन्दगी का इक बहाना हो गए हैं ,

Monday, February 7, 2011

दूंदने वाले बता तू क्यों परेशां हो रहा है,
जिस्म दो थे कल यहाँ इक जान अब वो हो गए हैं,
वक्त के कितने अजूबे ,जिन्दगी में हो गए हैं ,
गुमशुदा क्यों हम हुए हैं ,वो हमीं में खो गए हैं ,
वक्त के कितने अजूबे ,जिन्दगी में हो गए हैं ,
गुमशुदा क्यों हम हुए हैं ,वो हमीं में खो गए हैं ,

Saturday, February 5, 2011

आखिरी मंजिल कहाँ है , ये यहाँ सबको पता है,
मैं धरा की खिड़कियों पर ,गुनगुनाना चाहता हूँ ,
एक मीठा छल-छलावा, क्यों अभी तक चल रहा है,
बेखुदी में क्यों खुदा को आजमाना चाहता हूँ,
एक मीठा छल-छलावा, क्यों अभी तक चल रहा है,
बेखुदी में क्यों खुदा को आजमाना चाहता हूँ,

Friday, February 4, 2011

प्यार का सूरज कहाँ है, ये मुझे कोई बताये ,
मैं सिसकती जिन्दगी को, फिर मनाना चाहता हूँ,
आँसुओं की बूँद पीकर ,मुस्कुराना चाहता हूँ,
मैं दियों की बतियों में दिल जलाना चाहता हूँ,
बड़े शहरों में मध्यबर्गी जीवन ६०,००००० रूपये से शुरू होता है,
५०,००००० लाख का फ्लेट ,चार लाख की गाड़ी,शेष घर की दैनिक
उपभोग की चीजें ,यदि वेतन आठ लाख वार्षिक हो ,ये सब चीजें ,
मुठ्ठी में होंगी ,विकास भी यहीं से शुरू होता है .
जिन्हें यह स्तर मिल चुका है ,भारत के विकास में उनका भबिष्य
उज्जवल होगा ,मगर जो अगले दस बर्ष तक भी इसकी कल्पना नहीं कर सकते
उन्हें न सिर्फ मंहगाई मारेगी, बहुत संघर्ष करना पड़ेगा .
तुषार, गाजियाबाद