यह नज़ारे खिल रहे हैं,एक तेरी ही झलक से,
लग रहा तू आ रही है, आज फिर जैसे फलक से,
खुशबुएँ कितनी नशीली, भीग कर बहने लगीं हैं,
चाहता हूँ साँस ले लूँ आखिरी तेरी ललक से,
क्या पता तू प्यार का, सामान फिर कोई जुटा ले ,
Thursday, March 24, 2011
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