Wednesday, May 26, 2010

मन न माने,मन न माने
मन न माने,मन न माने
जिन्दगी के ये बहाने ....
रोम जिनमें रोम तेरे
मिल गए थे .जिन्दगी थी
शब्द जिनमें शब्द तेरे
घुल गए थे ,जिन्दगी थी .
कौन जाने ,कौन जाने
जिन्दगी के ये बहाने .
मन पिघलते दर्द का
दरिया बना -सा रह गया है
क्यों द्रगों में स्वप्न तेरा
बस भरा -सा रह गया है .
वो ख़ुशी कैसे बिखेरें
जो हमें तुझसे मिली थी
क्यों हमारे हाथ में बस
एक कतरा रह गया है .
लोग मानें या न मानें
जिन्दगी के ये बहाने .
सिर्फ तेरे ही इशारे
हर तरफ छाए हुए थे
सिर्फ तेरे ही लिए बस
हम यहाँ आये हुए थे .
ये दिवस तेरे लिए थे
रैन भी तेरे लिए थीं
मौत के फिर बीच में क्यों
फासले छाए हुए थे .
तन न माने ,मन न माने .
जिन्दगी के ये बहाने .
तुषार \गीतों के बादल