Monday, April 11, 2011

यह छलक कर बह रहा है, यह मचल कर बह रही है, बीच में कितने युगों की ,कसमसाहट बह रही है, एक आँसू बह रहा है, एक नदिया बह रही है, बीच में कितने दिलों की ,टीस गहरी बह रही है,
हैं हवायें सब निरुत्तर, हैं दिशायें सब निरुत्तर, यह किसी की जुस्तजू में , रिक्त होता जा रहा है,
बर्फ की चट्टान पिघली, तो नदी यह बन गयी थी, किन्तु यह तो खुद पिघलकर ,खुद बरसता जा रहा है,

Sunday, April 10, 2011

चिर- प्रतीक्षित से द्रगों से ,यह निकल कर आ रहा है, मौन अपनी वेदना का ,रेत पर टपका रहा है,
एक आँसू बह रहा है, एक नदिया बह रही है , बीच में कितने युगों की प्यास गहरी बह रही है,

Tuesday, April 5, 2011

व्योम भरने के लिए ही ,हम यहाँ मिलते -बिछुड़ते , लुप्त होने के लिए ही वक्त से लड़ते-झगड़ते , किन्तु फिर भी अस्मितायें ,साथ चलतीं हैं हमारे, देह का आकार लेकर ,प्राण में उन्मेष भरते ,
व्योम भरने के लिए ही ,हम यहाँ मिलते -बिछुड़ते , लुप्त होने के लिए ही वक्त से लड़ते-झगड़ते , किन्तु फिर भी अस्मितायें ,साथ चलतीं हैं हमारे, देह का आकार लेकर ,प्राण में उन्मेष भरते ,

Monday, April 4, 2011

हम कभी होंगे अलग यह, प्रश्न ही पूरा गलत है , प्रेम के एहसास में ही, जन्म लेता यह जगत है, आज तेरी कल्पना ही ,हो गई मनुहार मेरी , रोज मेरी हर कशिस अब ,जिन्दगी का एक ख़त है ,

Sunday, April 3, 2011

हम कभी होंगे अलग यह ,प्रश्न ही पूरा गलत है, प्यार के अहसास में ही ,जन्म लेता यह जगत है ,

Saturday, April 2, 2011

जिन्दगी के ये थपेड़े ,कुछ सम्हलने के लिए हैं ,किन्तु दिल की हसरतें , कुछ कर गुजरने के लिए हैं ,छोड़ दूँ कैसे जमीं पर ,स्वप्न जो बिखरे हुए हैं ,अश्रु से मेरे इन्हीं की ,फ़स्ल उगने के लिए हैं
चाहता हूँ बाग़ कोई ,याद में तेरी लगा लूँ , पक्षियों को डालियों पर ,डोलने को ही बुला लूँ , चहचहा कर जब कहेंगे ,हाल तेरा वो यहाँ पर , क्या पता उन शोखियों की, छाँव में खुद को भुला दूँ,