Monday, February 28, 2011

कामिनी का बिम्ब कोई ,झील में उतरा हुआ है ,
मधु-ऋतु का एक मौसम ,फिर यहाँ बिखरा हुआ है,
पूछती हैं क्यों हवाएं , हाल मेरी धड़कनों का ,
कुफ्र में लिपटे हुए, हालात मेरे चल रहे हैं ,
सिर्फ तुझसे ही शुरू थी, जिन्दगी की ये कहानी,
हुस्न में डूबे हुए ,जज्बात मेरे चल रहे हैं,

Sunday, February 27, 2011

द्रश्य चेतन, ओ, अचेतन ,इस तरह क्यों खींचते हैं ,
प्रियतमा के बिम्ब अक्सर, आत्मा में दीखते हैं,
मैं नहाया डूबकर जब, फ़क्त इतना याद आया,
रेत की सूखी सतह पर ,मीन, उछली जा रही थी,
मैं नहाया आंसुओं में ,रात फिसली जा रही थी ,

Saturday, February 26, 2011

शब्द के कतरे पिरोकर ,वेदना जब गुनगुनाई,
बूँद अमृत की बिलोकर , बह रही थी रोशनाई,
प्रीत का इजहार कितने युग अनंतों तक चलेगा ,
व्योम में छिटकी हुई -सी एक बदली गा रही थी,
शब्द के कतरे पिरोकर ,वेदना जब गुनगुनाई
बूँद अमृत की बिलोकर, बह रही थी रोशनाई, ,
प्रीत का व्यापार कितने युग अनंतों तक चलेगा,
व्योम में छिटकी हुई -सी एक बदली जा रही थी,
मैं नहाया आंसुओं में, रात फिसली जा रही थी,
पर्वतों पर जो जमीं थी बर्फ पिघली जा रही थी ,
क्यों मुझे इतना नहाना ,इस तरह अच्छा लगा था,
बात तेरी चल रही थी , जान निकली जा रही थी ,

Friday, February 25, 2011

अवतरित होकर जगत में, इस तरह फिर आ गईं तुम,
काल- भैरब जिन्दगी में ,अफ्सरा- सी छा गईं तुम,
इक चिरंतन सत्य झलका , पारदर्शी -इंगितों में,
स्रष्टि की परिकल्पना में,दामिनी -सी घुल गईं तुम,
चाँद से बातें हुईं जब, चांदनी में घुल गईं तुम,

Wednesday, February 23, 2011

ताज फीका पड़ रहा था, वक्त धीमे चल रहा था ,
गुरबतों का इक शहंशाह ,गुलबदन से मिल रहा था ,
चाँद का था बस बहाना ,बात तुमसे हो रही थी ,
रश्मियों की थीं फुहारें , लावनी में धुल गईं तुम ,
चाँद से बातें हुईं जब............................

Tuesday, February 22, 2011

चाँद से बातें हुईं जब, चांदनी में घुल गईं तुम,
रात के नीरव क्षणों में ,रागिनी- सी घुल गईं तुम,
दूर तक कोई नहीं था ,तुम उतरती जा रहीं थीं ,
एक आँचल में लिपटकर ,मोहिनी -सी खिल गईं तुम ,

Sunday, February 20, 2011

अक्स मन का आयनों में ,देखने की जिद मुझे है,
आँख में मेरी उतरकर , आयनों को गश दिला दो,
रात- रानी की हवा में ,खुशबुएँ बहने लगीं हैं,
एक खुशबु और उनमें, घोलकर मेरी मिला दो ,

Tuesday, February 8, 2011

स्वप्न में आने लगे वो ,धड़कनों से बात करने ,
इस जहाँ में जिन्दगी का इक बहाना हो गए हैं ,

Monday, February 7, 2011

दूंदने वाले बता तू क्यों परेशां हो रहा है,
जिस्म दो थे कल यहाँ इक जान अब वो हो गए हैं,
वक्त के कितने अजूबे ,जिन्दगी में हो गए हैं ,
गुमशुदा क्यों हम हुए हैं ,वो हमीं में खो गए हैं ,
वक्त के कितने अजूबे ,जिन्दगी में हो गए हैं ,
गुमशुदा क्यों हम हुए हैं ,वो हमीं में खो गए हैं ,

Saturday, February 5, 2011

आखिरी मंजिल कहाँ है , ये यहाँ सबको पता है,
मैं धरा की खिड़कियों पर ,गुनगुनाना चाहता हूँ ,
एक मीठा छल-छलावा, क्यों अभी तक चल रहा है,
बेखुदी में क्यों खुदा को आजमाना चाहता हूँ,
एक मीठा छल-छलावा, क्यों अभी तक चल रहा है,
बेखुदी में क्यों खुदा को आजमाना चाहता हूँ,

Friday, February 4, 2011

प्यार का सूरज कहाँ है, ये मुझे कोई बताये ,
मैं सिसकती जिन्दगी को, फिर मनाना चाहता हूँ,
आँसुओं की बूँद पीकर ,मुस्कुराना चाहता हूँ,
मैं दियों की बतियों में दिल जलाना चाहता हूँ,
बड़े शहरों में मध्यबर्गी जीवन ६०,००००० रूपये से शुरू होता है,
५०,००००० लाख का फ्लेट ,चार लाख की गाड़ी,शेष घर की दैनिक
उपभोग की चीजें ,यदि वेतन आठ लाख वार्षिक हो ,ये सब चीजें ,
मुठ्ठी में होंगी ,विकास भी यहीं से शुरू होता है .
जिन्हें यह स्तर मिल चुका है ,भारत के विकास में उनका भबिष्य
उज्जवल होगा ,मगर जो अगले दस बर्ष तक भी इसकी कल्पना नहीं कर सकते
उन्हें न सिर्फ मंहगाई मारेगी, बहुत संघर्ष करना पड़ेगा .
तुषार, गाजियाबाद