Monday, March 28, 2011

मान लूँ कैसे यहाँ अब ,यह धरा मेरी नहीं है, आसमाँ मेरा नहीं है, जिन्दगी मेरी नहीं है, तैरते हैं स्वप्न क्यों फिर इस धरा की हलचलों में , प्यार का कोई बहाना, आज अब मेरा नहीं है..

Sunday, March 27, 2011

मंत्र मुग्धा ,स्वप्नदर्शी ,उर्वशी का रूप लेकर, क्या गजब तुम ढा रहीं थीं , ज्योत्स्ना की धूप लेकर, यह समुन्दर और बादल ,बन गए झरने तुम्हारे, तुम बिछाने आ गईं थीं ,जुस्तजू को सूप लेकर, खिल गईं कलियाँ सुकोमल, भोर की पहली किरन से, कल्पना में भाव-भीनी, कामनायें आ गईं थीं ,... बस तुम्हारी सुष्मिता की,अस्मितायें छा गईं थीं ....

Saturday, March 26, 2011

तुम धरा थीं या धरा का, रूप लेकर आ गईं थीं,
अनगिनत ऋतुएँ तुम्हारी देह पर लहरा गईं थीं,
पारदर्शी -चितवनों में ,बिम्ब झलके थे यहाँ फिर,
बस तुम्हारी सुष्मिता की,अस्मितायें छा गईं थीं,

Friday, March 25, 2011

यह जहाँ कितना हसीं है, सिर्फ तेरी ही कमी है,
सागरों में सिर्फ मेरे ,आंसुओं की ही नमी है,
तू नहाती है यहाँ जब, लोक तीनों डूबते हैं ,
सिर्फ तेरे ही लिए यह,जिन्दगी जैसे थमी है,
बादलों से फिर बरस कर ,बूँद अमृत की बहा ले,
यह हवायें चल रहीं हैं,हाथ में फिर हाथ डाले,

Thursday, March 24, 2011

यह नज़ारे खिल रहे हैं,एक तेरी ही झलक से,
लग रहा तू आ रही है, आज फिर जैसे फलक से,
खुशबुएँ कितनी नशीली, भीग कर बहने लगीं हैं,
चाहता हूँ साँस ले लूँ आखिरी तेरी ललक से,
क्या पता तू प्यार का, सामान फिर कोई जुटा ले ,

Wednesday, March 23, 2011

यह हवायें चल रहीं हैं,हाथ में फिर हाथ डाले,
आ रहे हैं हर तरफ से, आज तेरे ही उजाले,
क्या पता प्रतिबिम्ब तेरे ,झील में दिखने लगें फिर ,
क्या पता तू वक्ष से फिर ,झूमकर मुझको लगा ले ,

Monday, March 21, 2011

क्या बचा है इस धरा पर, क्या बचा है आसमाँ में,
एक जीवन प्यार का था, सो गया है, गुलसिताँ में,
एक बादल छा रहा है ,पुतलियों के बीच में फिर,
क्यों बरसना चाहता है, हलचलों के दरमियाँ में,
अमरीका व नाटो देशों की चेतावनी के बाबजूद जब गद्दाफी ने
जन विद्रोह दबाने के लिए सैनिक कार्रवाई तेज कर दी ,मजबूरन ,
नाटो देशों को नो फ्लाई जोंन घोषित करना पड़ा और लीबिया में शांति स्थापित करने के लिए
हवाई हमला करना पड़ा /यह बात और है उन्हें किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देने का हक़ नहीं है,
मगर तेल उत्पादक देशों में अशांत बातावरण भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता /
पूरी दुनिया की खनिज तेल आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है/
नाटो देशों की यह कार्रवाई अगर प्रशंसनीय नहीं तो अनुचित भी नहीं है/
तुषार, वैशाली, गाजियाबाद..

Wednesday, March 16, 2011

हो सकता है इस दुनिया में, मंजर सभी तबाही के हों,
लेकिन एटम की झाड़ू से,मंजर सारे मिट जाते हैं ,
माना मुश्किल है दुश्मन से ,लोहा लेना युद्ध-भूमि में ,
लेकिन एटम की धूलों से, खाक नज़ारे हो जाते हैं ..

Tuesday, March 15, 2011

परमाणु शक्ति का अब तो, खेल शुरू होने बाला है,
अमरीका से जाकर पूछो ,कितनी उसकी मूँछ बची है

Monday, March 14, 2011

मुक्त गगन में मन का पंछी, उड़ने की जिद क्यों करता है,
मुक्त हवाओं के झोंकों में ,ऋतुओं का मेला लगता है,
मदिर -मदिर -सी तेरी ऋतुएँ ,मुझको यहाँ बहानी हैं,
मुझको अब तो इस दुनिया में ,दुनिया नई बसानी है,...
मुझसे न पूछ आकर ये आँखों में तलब क्यों है,
बस इतना मुझे बता दे ,तू इतनी गजब क्यों है ,
ओस बिछेगी जब धरती पर, सूरज पीने आ जायेगा ,
लेकिन मेरा आँसू तो बस , तेरा बादल बन जायेगा ,
कोई प्यासा अगर मिला तो ,उसकी प्यास बुझानी है,
मुझको अब तो इस दुनिया में ,दुनिया नई बसानी है ....2

Sunday, March 13, 2011

अब जितने भी पल आयेंगे , सब तेरे ही हो जायेंगे,
मुझको अब तो इस दुनिया में , दुनिया नई बसानी है,
गीत लिखूँगा जब भी तेरे , दिल की राहों से गुजरेंगे ,
अरमानों की सुबहा कोई ,मुझको नई जगानी है ...1

Saturday, March 12, 2011

इस जहाँ में वो तुम्हारे , फाग इतने घुल चुके हैं ,
धूल -मिट्टी में मिला दूँ ,एक बगिया किस तरह मैं,

Friday, March 11, 2011

क्यों मुझे इतिहास का इक, मकबरा अच्छा लगा है,
इक शहंशाह के जिगर का ,तस्करा अच्छा लगा है,
क्यों तुम्हारा जिक्र अक्सर , एक यमुना कर रही है,
क्यों रूहानी जिन्दगी का ,मशबरा अच्छा लगा है ,
चाँद भीगा जा रहा था , रात डूबी जा रही थी ,
सिलसिला जो प्यार का था , आँसुओं पर मुस्कुराया,

Thursday, March 10, 2011

जब तुम्हारी याद आई, चाँदनी में , मैं नहाया,
शोखियों का एक मंजर, आँसुओं में छलछलाया ,
रात-रानी की हवा में ,खुशबुएँ बहने लगीं हैं,
एक पल में फिर बसा लूँ , एक दुनिया किस तरह में ,

Wednesday, March 9, 2011

बंद पलकों में तुम्हारे ,ख्वाव इतने भर चुके हैं,
एक आँसू में बहा दूँ ,एक दरिया किस तरह मैं ,
आयने में और तुममें ,फर्क अब क्या रह गया है,
जिन्दगी आकर खड़ी है ,आयने के सामने,

Tuesday, March 8, 2011

चाहता हूँ आयने में, .कैद तुमको कर सकूँ,
प्यार मेरा झिलमिलाये ,आयने के सामने ..
क्यों बिखरना चाहता हूँ ,क्या समझना चाहता हूँ,
होश मेरे खो रहे हैं,आयने के सामने ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,आयने के सामने,
वो, अभी तक छा रहे हैं ,आयने के सामने ,
आयने से बात करके ,जी बहलना चाहता है,
एक कतरा और दिल का ,यों सिसकना चाहता है,

Monday, March 7, 2011

आज सारी धूल उड़कर ,इस तरह गुजरी यहाँ पर ,
आँख में जैसे उसी की ,धुन्द के बादल भरे थे ,
एक बंजर जिन्दगी से, वो लिपटती जा रही थी ,
राह में जैसे उसी की ,देह के बल्कल पड़े थे,
सैकड़ों बिखरी हुई सी कतरने उड़ने लगीं थीं ,
बेतहाशा ,सरसराती,आंधियां उठने लगीं थीं,
क्या पता कबसे जिगर के ,स्रोत सूखे जा रहे थे ,
काल-कवलित मृगतृषायें ,खाक में मिलने लगीं थीं ,
स्वप्न तो क्या देखते हम धूल के काजल भरे थे ,

Thursday, March 3, 2011

न कोई भी किनारा था , न कोई भी हरारा था,
कहाँ तक दूर जायेंगे ,तसब्बुर बस तुम्हारा था,
घिरी तूफाँ में किश्ती थी, भंवर भी बस तुम्हारे थे,
न बाहर हम कभी निकलें ,इरादे ये हमारे थे ,

Wednesday, March 2, 2011

युगों की प्यास अधरों पर,कहाँ तक बुझ गई होगी,
सुधा की बूँद से भरकर ,समंदर बन गई होगी,
कभी बुलबुल सुनाने को, तराने आ गई होगी,
बहारों की छठा कोई, उतरकर छा गई होगी,
कभी सूरज थमा होगा, कभी चंदा थमा होगा,
तुम्हारे हुस्न में डूबी, क़यामत आ गई होगी,
कहानी जब बनी होगी, तुम्हीं से लिख गई होगी,
निगाहों में , निगाहों की ,निशानी बन गई होगी,
कभी झरने झरे होंगे ,कभी बादल उठे होंगे ,
कभी रिमझिम फुहारों में ,जवानी खिल गई होगी,

Tuesday, March 1, 2011

रूह में तेरे कभी की,रूह मेरी मिल चुकी है,
इस धरा की शोखियों में, झिलमिलाती दिख रही है,
शेष मुझमें क्या बचा है, एक मिट्टी का खिलौना,
वक्ष पर महके हुए ,वात, तेरे चल रहे हैं ,