Monday, March 28, 2011
Sunday, March 27, 2011
मंत्र मुग्धा ,स्वप्नदर्शी ,उर्वशी का रूप लेकर, क्या गजब तुम ढा रहीं थीं , ज्योत्स्ना की धूप लेकर, यह समुन्दर और बादल ,बन गए झरने तुम्हारे, तुम बिछाने आ गईं थीं ,जुस्तजू को सूप लेकर, खिल गईं कलियाँ सुकोमल, भोर की पहली किरन से, कल्पना में भाव-भीनी, कामनायें आ गईं थीं ,... बस तुम्हारी सुष्मिता की,अस्मितायें छा गईं थीं ....
Saturday, March 26, 2011
Friday, March 25, 2011
Thursday, March 24, 2011
Wednesday, March 23, 2011
Monday, March 21, 2011
अमरीका व नाटो देशों की चेतावनी के बाबजूद जब गद्दाफी ने
जन विद्रोह दबाने के लिए सैनिक कार्रवाई तेज कर दी ,मजबूरन ,
नाटो देशों को नो फ्लाई जोंन घोषित करना पड़ा और लीबिया में शांति स्थापित करने के लिए
हवाई हमला करना पड़ा /यह बात और है उन्हें किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देने का हक़ नहीं है,
मगर तेल उत्पादक देशों में अशांत बातावरण भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता /
पूरी दुनिया की खनिज तेल आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है/
नाटो देशों की यह कार्रवाई अगर प्रशंसनीय नहीं तो अनुचित भी नहीं है/
तुषार, वैशाली, गाजियाबाद..
जन विद्रोह दबाने के लिए सैनिक कार्रवाई तेज कर दी ,मजबूरन ,
नाटो देशों को नो फ्लाई जोंन घोषित करना पड़ा और लीबिया में शांति स्थापित करने के लिए
हवाई हमला करना पड़ा /यह बात और है उन्हें किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देने का हक़ नहीं है,
मगर तेल उत्पादक देशों में अशांत बातावरण भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता /
पूरी दुनिया की खनिज तेल आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है/
नाटो देशों की यह कार्रवाई अगर प्रशंसनीय नहीं तो अनुचित भी नहीं है/
तुषार, वैशाली, गाजियाबाद..
Wednesday, March 16, 2011
Tuesday, March 15, 2011
Monday, March 14, 2011
Sunday, March 13, 2011
Saturday, March 12, 2011
Friday, March 11, 2011
Thursday, March 10, 2011
Wednesday, March 9, 2011
Tuesday, March 8, 2011
Monday, March 7, 2011
आज सारी धूल उड़कर ,इस तरह गुजरी यहाँ पर ,
आँख में जैसे उसी की ,धुन्द के बादल भरे थे ,
एक बंजर जिन्दगी से, वो लिपटती जा रही थी ,
राह में जैसे उसी की ,देह के बल्कल पड़े थे,
सैकड़ों बिखरी हुई सी कतरने उड़ने लगीं थीं ,
बेतहाशा ,सरसराती,आंधियां उठने लगीं थीं,
क्या पता कबसे जिगर के ,स्रोत सूखे जा रहे थे ,
काल-कवलित मृगतृषायें ,खाक में मिलने लगीं थीं ,
स्वप्न तो क्या देखते हम धूल के काजल भरे थे ,
आँख में जैसे उसी की ,धुन्द के बादल भरे थे ,
एक बंजर जिन्दगी से, वो लिपटती जा रही थी ,
राह में जैसे उसी की ,देह के बल्कल पड़े थे,
सैकड़ों बिखरी हुई सी कतरने उड़ने लगीं थीं ,
बेतहाशा ,सरसराती,आंधियां उठने लगीं थीं,
क्या पता कबसे जिगर के ,स्रोत सूखे जा रहे थे ,
काल-कवलित मृगतृषायें ,खाक में मिलने लगीं थीं ,
स्वप्न तो क्या देखते हम धूल के काजल भरे थे ,
Thursday, March 3, 2011
Wednesday, March 2, 2011
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