Sunday, March 27, 2011
मंत्र मुग्धा ,स्वप्नदर्शी ,उर्वशी का रूप लेकर, क्या गजब तुम ढा रहीं थीं , ज्योत्स्ना की धूप लेकर, यह समुन्दर और बादल ,बन गए झरने तुम्हारे, तुम बिछाने आ गईं थीं ,जुस्तजू को सूप लेकर, खिल गईं कलियाँ सुकोमल, भोर की पहली किरन से, कल्पना में भाव-भीनी, कामनायें आ गईं थीं ,... बस तुम्हारी सुष्मिता की,अस्मितायें छा गईं थीं ....
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