आज सारी धूल उड़कर ,इस तरह गुजरी यहाँ पर ,
आँख में जैसे उसी की ,धुन्द के बादल भरे थे ,
एक बंजर जिन्दगी से, वो लिपटती जा रही थी ,
राह में जैसे उसी की ,देह के बल्कल पड़े थे,
सैकड़ों बिखरी हुई सी कतरने उड़ने लगीं थीं ,
बेतहाशा ,सरसराती,आंधियां उठने लगीं थीं,
क्या पता कबसे जिगर के ,स्रोत सूखे जा रहे थे ,
काल-कवलित मृगतृषायें ,खाक में मिलने लगीं थीं ,
स्वप्न तो क्या देखते हम धूल के काजल भरे थे ,
Monday, March 7, 2011
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