मुक्त गगन में मन का पंछी, उड़ने की जिद क्यों करता है,
मुक्त हवाओं के झोंकों में ,ऋतुओं का मेला लगता है,
मदिर -मदिर -सी तेरी ऋतुएँ ,मुझको यहाँ बहानी हैं,
मुझको अब तो इस दुनिया में ,दुनिया नई बसानी है,...
Monday, March 14, 2011
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